शिव चालीसा और आरती | Shiv Chalisa And Aarti

Shiv Chalisa And Aarti: भगवान शिव सर्वोच्च देवता हैं। भगवान शिव की अनुकंपा का कोई अंत नहीं है। यदि वह किसी भक्त से प्रसन्न हो जाता है, तो वह व्यक्ति भौतिक संसार की माया को पार करते हुए, भगवान शिव की भक्ति में लीन हो जाता है, और इस संसार में सभी सुखों का आनंद लेता है।

वैसे तो भगवान शिव की पूजा विधि बहुत कठिन नहीं है, लेकिन भगवान शिव की कुछ साधनाएं हैं जो थोड़ी चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन अगर कोई भक्त ठान ले तो कुछ भी मुश्किल नहीं है। भगवान शिव के साधना में एक शिव चालीसा भी है, जो बहुत ही सरल और प्रभावी है और इसका पाठ करने से व्यक्ति पूर्ण साधना का फल प्राप्त कर सकता है। आइए हम इस लेख में त्रिशूल चलाने वाले देवता भगवान शिव की चालीसा का पाठ करते हैं।

शिव चालीसा (Shiv chalisa and aarti)

दोहा

जय गणेश गिरिजासुवन मंगल मूल सुजान । कहत अयोध्यादास तुम देउ अभय वरदान ॥

  • जय गिरिजापति दीनदयाला । सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥ 1
  • भाल चन्द्रमा सोहत नीके । कानन कुण्डल नाग फनी के ॥ 2
  • अंग गौर शिर गंग बहाये । मुण्डमाल तन क्षार लगाये ॥ 3
  • वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे । छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4
  • मैना मातु कि हवे दुलारी । वाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥ 5
  • कर त्रिशूल सोहत छवि भारी । करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥ 6
  • नंदी गणेश सोहैं तहं कैसे । सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥ 7
  • कार्तिक श्याम और गणराऊ । या छवि कौ कहि जात न काऊ ॥ 8
  • देवन जबहीं जाय पुकारा । तबहिं दुख प्रभु आप निवारा ॥ 9
  • किया उपद्रव तारक भारी । देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥ 10
  • तुरत षडानन आप पठायौ । लव निमेष महं मारि गिरायौ ॥ 11
  • आप जलंधर असुर संहारा । सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12
  • त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई । तबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥ 13
  • किया तपहिं भागीरथ भारी । पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥ 14
  • दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं । सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥ 15
  • वेद माहि महिमा तुम गाई । अकथ अनादि भेद नहीं पाई ॥ 16
  • प्रकटे उदधि मंथन में ज्वाला । जरत सुरासुर भए विहाला ॥ 17
  • कीन्ह दया तहं करी सहाई । नीलकंठ तब नाम कहाई ॥ 18
  • पूजन रामचंद्र जब कीन्हां । जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥ 19
  • सहस कमल में हो रहे धारी । कीन्ह परीक्षा तबहिं त्रिपुरारी ॥ 20
  • एक कमल प्रभु राखेउ जोई । कमल नयन पूजन चहं सोई ॥ 21
  • कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर । भये प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥ 22
  • जय जय जय अनंत अविनाशी । करत कृपा सबके घट वासी ॥ 23
  • दुष्ट सकल नित मोहि सतावैं । भ्रमत रहौं मोहे चैन न आवैं ॥ 24
  • त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो । यह अवसर मोहि आन उबारो ॥ 25
  • ले त्रिशूल शत्रुन को मारो । संकट से मोहिं आन उबारो ॥ 26
  • मात पिता भ्राता सब कोई । संकट में पूछत नहिं कोई ॥ 27
  • स्वामी एक है आस तुम्हारी । आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28
  • धन निर्धन को देत सदा ही । जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥n29
  • अस्तुति केहि विधि करों तुम्हारी । क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥ 30
  • शंकर हो संकट के नाशन । मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥ 31
  • योगी यति मुनि ध्यान लगावैं । शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32
  • नमो नमो जय नमः शिवाय । सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥ 33
  • जो यह पाठ करे मन लाई । ता पर होत हैं शम्भु सहाई ॥ 34
  • रनियां जो कोई हो अधिकारी । पाठ करे सो पावन हारी ॥ 35
  • पुत्र होन की इच्छा जोई । निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36
  • पण्डित त्रयोदशी को लावे । ध्यान पूर्वक होम करावे ॥ 37
  • त्रयोदशी व्रत करै हमेशा । तन नहिं ताके रहै कलेशा ॥ 38
  • धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे । शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥ 39
  • जन्म जन्म के पाप नसावे । अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी । जानि सकल दुख हरहु हमारी ॥

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शिव शंकर जी की आरती (Shiv ji ki Aarti)

भगवान शिव को शंकर, भोलेनाथ और महादेव नाम से पुकारते हैं। उनकी स्तुति मुख्य रूप से सोमवार, मासिक तेरहवें दिन और दो मुख्य शिवरात्रि त्योहारों पर की जाती है। इन दिनों और त्योहारों पर शिव जी की आरती खास तरीके से की जाती है।

  • ॐ जय शिव ओंकारा,
    स्वामी जय शिव ओंकारा। ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव,
    अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥ 1
  • एकानन चतुरानन
    पंचानन राजे । हंसासन गरूड़ासन
    वृषवाहन साजे ॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥ 2
  • दो भुज चार चतुर्भुज
    दसभुज अति सोहे । त्रिगुण रूप निरखते
    त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥ 3
  • अक्षमाला वनमाला,
    मुण्डमाला धारी । चंदन मृगमद सोहै,
    भाले शशिधारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥ 4
  • श्वेताम्बर पीताम्बर
    बाघम्बर अंगे । सनकादिक गरुणादिक
    भूतादिक संगे ॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥ 5
  • कर के मध्य कमंडल
    चक्र त्रिशूलधारी । सुखकारी दुखहारी
    जगपालन कारी ॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥ 6
  • ब्रह्मा विष्णु सदाशिव
    जानत अविवेका । प्रणवाक्षर में शोभित
    ये तीनों एका ॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥ 7
  • त्रिगुणस्वामी जी की आरति
    जो कोइ नर गावे । कहत शिवानंद स्वामी
    सुख संपति पावे ॥ ॐ जय शिव ओंकारा ॥ 8

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